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अवकाश हेतु प्रार्थना पत्र संस्कृत में

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 अवकाश हेतु प्रार्थना पत्र संस्कृत में |

Sanskrit ma parichay

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Class 8 sanskrit chapter 12 hindi translation part 2

  द्वादशः पाठः कः रक्षति कः रक्षितः Hindi translation Part - 2 (नदीतीरं गन्तुकामा: बाला: यत्र तत्र अवकरभाण्डारं दृष्ट्रा वार्तालापं कुर्वन्ति) (नदी के किनारे जाने के इच्छुक बालक जहाँ- तहाँ- गंदगी के  ढेर देखकर वार्तालाप करते हैं) जोसेफ: पश्यंतु मित्राणि यत्र तत्र प्लास्टिकस्यूतानि अन्यत् चावकरं प्रक्षिप्तमस्तिः । कथ्यते यत् स्वच्छता स्वास्थ्यकरी परं वयं तु शिक्षिताः अपि अशिक्षित इवाचरामः अनेन प्रकारेण जोसेफ मित्र देखो जहाँ- तहाँ प्लास्टिक का थैला तथा अन्य कूड़ा फेंका हुआ है। कहा जाता है कि स्वच्छता स्वास्थ्यकर होती है परंतु हम शिक्षित होते हुए भी अनपढ़ों की तरह आचरण करते हैं। वैभव- गृहाणि तु अस्माभिः नित्यं | स्वच्छानि क्रियन्ते परं किमर्थं स्वपर्यावरणस्य स्वच्छतां प्रति ध्यानं न दीयते विनय - पश्य पश्य उपरितः इदानीमपि अवकर मार्गे क्षिप्यते । वैभव- इस प्रकार हम घरों को नित्य | स्वच्छ करते हैं परंतु किसलिए अपने पर्यावरण की स्वच्छता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। विनय - देखो, देखो ऊपर से अब भी मार्ग में कूड़ा डाला जा रहा है | (आहूय ) महोदय कृपा कुरु मार्गे भ्रमद्भ्यः । एतत् तु स...

Class 8 sanskrit chapter 12 hindi translation part - 1

 ‌ द्वादशः पाठः कः रक्षति कः रक्षितः Hindi translation Part - 1 (ग्रीष्मर्ती सांयकाले विद्युदभावे प्रचंडोष्मा पीड़ित: वैभव: गृहात निष्क्रामति) गर्मी की ऋतु में शाम को बिजली के अभाव में तेज़ गर्मी के द्वारा पीड़ित वैभव घर से बाहर निकलता है। वैभव - अरे परमिंदर! अपि त्वमपि विदयुदभावेन पीड़ितः बहिरागत ? वैभव- अरे परमिंदर! क्या तुम भी बिजली के अभाव से पीड़ित होकर बाहर आ गए हो? परमिंदर - आम् मित्र! एकत: प्रचंडातपकाल: अन्यतश्च विद्युदभावः परं बहिरागत्यापि पश्यामि यत् वायु वेग: तु सर्वथाऽवरुद्धः। सत्यमेवोक्तम् परमिंदर - हाँ, मित्र! एक तो तेज़ गर्मी का समय दूसरे बिजली का अभाव - परंतु बाहर आकर भी देखता हूँ कि वायु की गति पूर्णतः रुक गई है सच ही कहा है | प्राणिति पवनेन जगत् सकलं, सृष्टि निखिला चैतन्मयी क्षणमपि न जीव्यतेऽनेन विना, सर्वातिशायिमूल्यः पवनः ।। पवन के द्वारा समस्त जगत तथा चैतन्यपूर्ण यह समग्र सृष्टि जीवित है। इसके बिना क्षण भर भी जीवित नहीं रहा जाता है। सबसे अधिक मूल्य वाली वायु है। विनयः - अरे मित्र! शरीरात न केवलं श्वेद बिंदव: अपितु श्वेदधाराः इव प्रस्रवन्ति स्मृतिपथमायति शुक्ल म...

Class 8 sanskrit chapter 11 hindi translation

  एकादशः पाठः सावित्री बाईफुले Hindi translation उपरि निर्मितं चित्रम् पश्यत । इदम् चित्रम् कस्याश्चित् पाठशालायाः वर्तते । इयं सामान्या पाठशाला नास्ति । इयमस्ति महाराष्ट्रस्य प्रथमा कन्या पाठशाला एका शिक्षिका गृहात् पुस्तकानि आदाय चलति । ऊपर बने हुए चित्र को देखो। यह चित्र किसी पाठशाला का है । यह सामान्य पाठशाला नहीं है। यह महाराष्ट्र की पहली कन्या पाठशाला है। एक अध्यापिका घर से पुस्तके लेकर चलती है | मार्गे कश्चित् तस्याः उपरि धूलिं कश्चित् च प्रस्तरखण्डान् क्षिपति। परं सा स्वदृढनिश्चयात् न विचलति । स्वविद्यालये कन्याभिः सविनोदम् आलपन्ती सा अध्यापने संलग्ना भवति । तस्याः स्वकीयम् अध्ययनमपि सहैव प्रचलति । केयं महिला ? अपि यूयमिमां महिलां जानीथ? | इयमेव महाराष्ट्रस्य प्रथमा महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले नामधेया। रास्ते में कोई उसके ऊपर धूल और पत्थर के छोटे टुकड़े फेंकता है परंतु वह अपने दृढ़ निश्चय से विचलित नहीं होती। अपने विद्यालय में कन्याओं के साथ हँसी मजाक करती हुई अपने अध्यापन में लगन से लगी रहती है। उसका अपना अध्ययन भी साथ ही चलता है। कौन है यह महिला ? तुम भी इस महिला को ज...

Class 8 sanskrit chapter 10 hindi translation

  दशमः पाठः नीतिनवनीतम् Hindi translation 1. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन: ।  चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।। अनुवाद- स्वभाव से हमेशा प्रणाम करने वाले की, बड़े बूढ़ों की सेवा करने वाले की चार चीजें बढ़ती हैं- आयु, विद्या, यश और बल ॥ 2.थं मातापितरौ क्लेशं सहते सम्भवे नृणाम | न तरथ निष्कृति: शक्या कर्तुं वर्षशरीरपि।। अनुवाद - जब माता-पिता मनुष्य (बच्चे) को जन्म देते समय जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सौ वर्षों तक भी नहीं चुकाया जा सकता। 3. तयोर्नित्यं प्रियम् कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा ।  तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वः समाप्यते ।। अनुवाद उन दोनों का (माता पिता) और गुरु का हमेशा प्रिय करना चाहिए। उन तीनों के प्रसन्न होने पर सभी तप समाप्त हो जाते हैं। 4. सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।  एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।। अनुवाद - दूसरों के अधीन होने पर हमेशा दुखी होते हैं, अपने वश में हमेशा सुखी रहते हैं। सुख-दुख की यह संक्षिप्त में परिभाषा दी गई है । 5. यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः ।  तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु...